क्या हुआ: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो से ज़्यादा बच्चे होने पर सज़ा देने वाले कानून अब प्रासंगिक नहीं रहे, क्योंकि भारत की प्रजनन दर गिरकर 1.9 पर आ गई है; 2003 के फैसले पर दोबारा विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेजा
कब: फैसला बुधवार, 4 नवंबर 2026
कहां: सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली; मामला महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की सरपंच से जुड़ा
आपके लिए मतलब: कई राज्यों में पंचायत-नगर निकाय चुनाव लड़ने पर लगी दो-बच्चा शर्त पर आगे बड़ा फैसला आ सकता है; फिलहाल मौजूदा कानून रद्द नहीं हुए हैं
क्या करें: अगर आप स्थानीय चुनाव लड़ना चाहते हैं तो अपने राज्य का मौजूदा नियम देखें; बड़ी बेंच का फैसला आने तक वही लागू रहेगा
करीब 23 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने जिस दो-बच्चा नियम को सही ठहराया था, अब उसी अदालत ने उस पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की अगुवाई वाली बेंच ने बुधवार को 37 पन्नों के फैसले में कहा कि दो से ज़्यादा बच्चे होने पर दंड देने वाले कानून “अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं”।
मामला क्या था
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध फैसले के मुताबिक महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की एक महिला सरपंच का चुनाव इसलिए रद्द कर दिया गया था कि उनके दो से ज़्यादा बच्चे थे। यह महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्यता मानी गई। निचली अदालतों और राज्य के अधिकारियों ने यही माना था, जिसके खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।
कोर्ट ने क्या कहा
फैसले में लिखा है कि ऐसे कानूनों की नींव, यानी जनसंख्या विस्फोट का डर, पिछले कुछ दशकों के बदलावों से “ढह चुकी है”। 2003 में जब जावेद बनाम हरियाणा राज्य केस में ऐसे कानूनों को सही ठहराया गया था, तब देश की कुल प्रजनन दर (TFR) 3.0 थी। अब यह 1.9 है, जबकि 2.1 को रिप्लेसमेंट रेट माना जाता है, यानी वह दर जिस पर एक पीढ़ी खुद की जगह ले लेती है।
द हिंदू के मुताबिक कोर्ट ने चेताया कि आबादी अभी घट नहीं रही, लेकिन प्रजनन दर गिरने से देश तेज़ी से बुज़ुर्ग होती आबादी की ओर बढ़ेगा। 60 साल से ऊपर के लोगों का हिस्सा 2014 के 8.3% से बढ़कर 2024 में 9.7% हो चुका है और 2036 तक करीब 15% होने का अनुमान है।
बेंच ने यह भी कहा कि ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर देते हैं और लोगों को बच्चे पैदा करने और लोकतंत्र में हिस्सेदारी के बीच चुनने पर मजबूर करते हैं। कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन की स्वायत्तता पर चोट माना।
आगे क्या
दो जजों की बेंच 2003 के फैसले को खुद पलट नहीं सकती, इसलिए उसने मौजूदा केस की कार्यवाही रोककर मामला बड़ी बेंच को भेज दिया है। The Week और ThePrint ने भी इसे दो-बच्चा नियम पर बड़ी टिप्पणी बताया है। कोर्ट ने साफ किया कि महाराष्ट्र के कानून की संवैधानिक वैधता को सीधे चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए वह उस पर फैसला नहीं दे रहा। राजस्थान, हरियाणा समेत कई राज्यों में ऐसी शर्तें रही हैं, इसलिए बड़ी बेंच का फैसला दूर तक असर डाल सकता है।
क्या दो-बच्चा नियम खत्म हो गया है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अप्रासंगिक बताया है और मामला बड़ी बेंच को भेजा है; अंतिम फैसला आने तक राज्यों के मौजूदा कानून लागू हैं।
भारत की प्रजनन दर कितनी है?
फैसले में SRS 2024 रिपोर्ट के हवाले से कुल प्रजनन दर 1.9 बताई गई है, जो 2.1 के रिप्लेसमेंट रेट से कम है।
जावेद बनाम हरियाणा केस क्या है?
2003 का सुप्रीम कोर्ट फैसला, जिसमें पंचायत चुनाव में दो से ज़्यादा बच्चों वालों को अयोग्य ठहराने वाले हरियाणा के कानून को सही माना गया था।
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स्रोत
By SunoHub News





