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    उपहार सिनेमा अग्निकांड केस: 59 मौतों से अंसल भाइयों की सजा तक, 25 साल की कानूनी लड़ाई

    मामला: उपहार सिनेमा अग्निकांड, ग्रीन पार्क, दिल्ली
    घटना: 13 जून 1997, फिल्म ‘बॉर्डर’ का शो
    नुकसान: 59 लोगों की मौत, 100 से ज़्यादा घायल
    मुख्य मामला: सिनेमा मालिक सुशील और गोपाल अंसल लापरवाही से मौत (IPC 304A) में दोषी; 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने 30-30 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया
    सबूत छेड़छाड़ केस: अक्टूबर 2021 में दोषी, 7 साल की सजा; जुलाई 2022 में अपील पर सजा जेल में बिताई अवधि तक घटी, जुर्माना 3-3 करोड़

    13 जून 1997 की दोपहर दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में देशभक्ति फिल्म ‘बॉर्डर’ देखने आए परिवारों के लिए वह दिन एक त्रासदी बन गया। आग और धुएं से 59 लोगों की जान गई। यह मामला सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी, लंबी कानूनी लड़ाई और अदालत के रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की कहानी है, जो करीब 25 साल चली।

    उस दिन क्या हुआ

    शो के दौरान सिनेमा की इमारत में आग लगी और धुआं हॉल व बालकनी तक भर गया। बड़ी संख्या में लोगों की जान दम घुटने से गई। बाद में अदालतों ने सिनेमा मालिकों को सुरक्षा इंतज़ामों में लापरवाही का ज़िम्मेदार माना और उन्हें लापरवाही से मौत (IPC 304A) समेत धाराओं में दोषी ठहराया।

    जांच और मुकदमा

    इंडिया टुडे के घटनाक्रम के मुताबिक जुलाई 1997 में जांच दिल्ली पुलिस से CBI को सौंपी गई और नवंबर 1997 में 16 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई। सिनेमा के मालिक सुशील अंसल और गोपाल अंसल, प्रबंधन से जुड़े लोग समेत कई लोग आरोपी बनाए गए। पीड़ित परिवारों ने ‘एसोसिएशन ऑफ विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रेजेडी’ (AVUT) बनाकर केस की पैरवी की।

    20 नवंबर 2007 को ट्रायल कोर्ट ने 12 आरोपियों को दोषी ठहराया; अंसल भाइयों को लापरवाही से मौत के मामले में दो साल की सजा हुई। 19 दिसंबर 2008 को दिल्ली हाईकोर्ट ने दोष बरकरार रखा, लेकिन अंसल भाइयों की सजा घटाकर एक साल कर दी।

    सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ

    5 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अंसल भाइयों का दोष बरकरार रखा, पर सजा को लेकर दो जजों की राय अलग रही। मामला तीन जजों की बेंच के पास गया, जिसने 19 अगस्त 2015 को दोनों पर 30-30 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया और कहा कि तीन महीने में जुर्माना भरने पर जेल की सजा पहले से काटी गई अवधि तक सीमित रहेगी। यह रकम दिल्ली में ट्रॉमा सेंटर बनाने या सुधारने के लिए थी। पीड़ित परिवारों की पुनर्विचार याचिका पर 9 फरवरी 2017 को कोर्ट ने गोपाल अंसल को हाईकोर्ट की दी हुई एक साल की सजा पूरी करने का आदेश दिया, जबकि सुशील अंसल की सजा उम्र के आधार पर काटी गई अवधि तक सीमित रही। दोनों पर 30-30 करोड़ रुपये का जुर्माना बना रहा।

    अदालत के रिकॉर्ड से छेड़छाड़

    मुकदमे के दौरान 2003 में पता चला कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड से कुछ अहम दस्तावेज़ गायब या फटे हुए हैं। कोर्ट के एक कर्मचारी को 2004 में बर्खास्त किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर मई 2006 में FIR दर्ज हुई और 2008 में अंसल भाइयों को भी इस केस में आरोपी बनाया गया।

    8 अक्टूबर 2021 को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने अंसल भाइयों समेत आरोपियों को सबूत से छेड़छाड़ का दोषी ठहराया। इंडिया टुडे के मुताबिक 8 नवंबर 2021 को दोनों भाइयों को सात साल की कैद और 2.25-2.25 करोड़ रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुलाई 2022 में दिल्ली की सेशंस कोर्ट ने अपील पर दोष बरकरार रखा, लेकिन सात साल की सजा को “कठोर और अपराध के अनुपात से ज़्यादा” बताते हुए जेल में बिताई गई अवधि तक घटा दिया और जुर्माना बढ़ाकर 3-3 करोड़ रुपये कर दिया। इसके बाद दोनों तिहाड़ से रिहा हुए।

    बदलाव जो इस केस से आए

    उपहार के बाद सिनेमाघरों और बड़े सार्वजनिक भवनों में फायर सेफ्टी, निकास रास्तों और लाइसेंस की जांच पर अदालतों और सरकारों ने ज़्यादा ज़ोर दिया। पीड़ित परिवारों की लंबी लड़ाई यह भी दिखाती है कि आम नागरिक कानूनी रास्ते से जवाबदेही तय करा सकते हैं।

    आपके लिए सुरक्षा सबक

    • सिनेमा, मॉल या बैंक्वेट हॉल में बैठते ही सबसे नज़दीकी एग्ज़िट साइन देख लें।
    • धुआं दिखे तो लिफ्ट नहीं, सीढ़ियों का इस्तेमाल करें; झुककर चलें और नाक-मुंह कपड़े से ढकें।
    • बंद या सामान से भरे निकास, खराब इमरजेंसी लाइट दिखें तो प्रबंधन और फायर विभाग से शिकायत करें।
    • आग लगने पर तुरंत 101 (फायर) या 112 पर कॉल करें।
    • भवन मालिक फायर NOC, नियमित ऑडिट और स्टाफ ट्रेनिंग कभी न टालें।

    उपहार अग्निकांड कब हुआ था?

    13 जून 1997 को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में फिल्म ‘बॉर्डर’ के शो के दौरान; 59 लोगों की मौत हुई।

    अंसल भाइयों को क्या सजा हुई?

    लापरवाही से मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में 30-30 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया; 2017 में गोपाल अंसल को बाकी एक साल की सजा काटने को कहा गया।

    सबूत छेड़छाड़ केस में क्या फैसला आया?

    नवंबर 2021 में 7 साल कैद और 2.25 करोड़ जुर्माना हुआ; जुलाई 2022 में अपील पर सजा जेल में बिताई अवधि तक घटा दी गई और जुर्माना 3-3 करोड़ कर दिया गया।

    आग लगने पर किस नंबर पर कॉल करें?

    फायर ब्रिगेड के लिए 101 या आपात नंबर 112।

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    स्रोत

  • जेसिका लाल हत्याकांड: बरी होने से उम्रकैद तक, दिल्ली के चर्चित केस की पूरी टाइमलाइन

    जेसिका लाल हत्याकांड: बरी होने से उम्रकैद तक, दिल्ली के चर्चित केस की पूरी टाइमलाइन

    मामला: जेसिका लाल हत्याकांड, दिल्ली
    घटना: 29-30 अप्रैल 1999 की रात, कुतुब कोलोनेड (महरौली) का एक रेस्टोरेंट-बार
    दोषी: मनु शर्मा (उम्रकैद); सबूत मिटाने में विकास यादव और अमरदीप सिंह गिल को 4 साल
    अदालती सफर: ट्रायल कोर्ट से बरी (फरवरी 2006) → दिल्ली हाईकोर्ट से दोषी (दिसंबर 2006) → सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी (19 अप्रैल 2010)
    मौजूदा स्थिति: सजा समीक्षा बोर्ड की सिफारिश पर जून 2020 में समय से पहले रिहाई

    दिल्ली के आपराधिक इतिहास में कुछ मामले ऐसे हैं जिन्होंने अदालतों, पुलिस और आम लोगों की सोच पर गहरा असर छोड़ा। जेसिका लाल हत्याकांड उनमें सबसे ऊपर है। एक पार्टी में ड्रिंक परोसने से इनकार करने पर एक युवा मॉडल की गोली मारकर हत्या हुई, सैकड़ों लोगों की मौजूदगी के बावजूद गवाह मुकर गए और ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। फिर जनता के दबाव, मीडिया की लगातार रिपोर्टिंग और पुलिस की अपील के बाद हाईकोर्ट ने फैसला पलटा। यह कहानी बताती है कि न्याय का रास्ता कितना लंबा हो सकता है, और गवाहों की भूमिका कितनी अहम है।

    उस रात क्या हुआ था

    अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक 29 अप्रैल 1999 की रात दक्षिण दिल्ली के महरौली इलाके में कुतुब कोलोनेड स्थित टैमरिंड कोर्ट नाम के रेस्टोरेंट-बार में एक निजी पार्टी चल रही थी। जेसिका लाल वहां पार्टी के दौरान बार संभाल रही थीं। आधी रात के बाद बार बंद हो चुका था। अभियोजन के अनुसार मनु शर्मा ने ड्रिंक मांगी और इनकार किए जाने पर पिस्तौल से गोली चला दी, जो जेसिका को लगी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां 30 अप्रैल की सुबह डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

    जांच और गिरफ्तारी

    द हिंदू की घटनाक्रम रिपोर्ट के अनुसार घटना के बाद आरोपी मौके से निकल गया। 2 मई 1999 को दिल्ली पुलिस ने उसकी गाड़ी नोएडा से बरामद की। 6 मई को मनु शर्मा ने चंडीगढ़ की एक अदालत में आत्मसमर्पण किया। इसके बाद सबूत छिपाने और साज़िश के आरोप में दूसरे सह-आरोपी भी पकड़े गए। 3 अगस्त 1999 को चार्जशीट दाखिल हुई और नवंबर 2000 में सेशंस कोर्ट ने हत्या, सबूत मिटाने, साज़िश और आर्म्स एक्ट की धाराओं में आरोप तय किए।

    गवाह मुकरे, ट्रायल कोर्ट से बरी

    मई 2001 में ट्रायल शुरू हुआ। अभियोजन ने 100 से ज़्यादा गवाह पेश किए, लेकिन कई अहम चश्मदीद अदालत में अपने पहले के बयानों से मुकर गए। कुछ गवाहों ने आरोपी को पहचाना, पर बचाव पक्ष ने “दो हथियार” की थ्योरी रखी। 21 फरवरी 2006 को ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कड़ियां अधूरी मानते हुए सभी नौ आरोपियों को बरी कर दिया।

    इस फैसले पर देशभर में नाराज़गी दिखी। इंडिया गेट पर कैंडल मार्च हुए और मीडिया ने गवाहों के मुकरने पर सवाल उठाए। दिल्ली पुलिस ने 13 मार्च 2006 को हाईकोर्ट में अपील दायर की।

    हाईकोर्ट ने फैसला पलटा

    हाईकोर्ट ने रोज़ाना सुनवाई की। 18 दिसंबर 2006 को अदालत ने मनु शर्मा को हत्या का दोषी ठहराया और ट्रायल कोर्ट के फैसले को रिकॉर्ड की “अपरिपक्व” समीक्षा बताया। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कोर्ट ने “दो हथियार” वाली थ्योरी को बचाव पक्ष की गढ़ी हुई कहानी माना। 20 दिसंबर 2006 को मनु शर्मा को उम्रकैद और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा मिली। सबूत मिटाने के मामले में विकास यादव और अमरदीप सिंह गिल को चार-चार साल की सजा हुई, जबकि छह अन्य बरी हुए।

    सुप्रीम कोर्ट की मुहर

    19 अप्रैल 2010 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तीनों अपीलें खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन ने अपराध संदेह से परे साबित किया है। कोर्ट ने चश्मदीदों के बयान, गाड़ी और कारतूसों से जुड़े सबूत और घटना के बाद आरोपी के आचरण को अहम माना। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच के दौरान “मीडिया ट्रायल” से आरोपी की बेगुनाही की कानूनी धारणा कमज़ोर नहीं होनी चाहिए।

    झूठी गवाही के सवाल पर भी कार्रवाई हुई। मई 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक प्रमुख गवाह और एक बैलिस्टिक विशेषज्ञ के खिलाफ झूठी गवाही (perjury) की कार्यवाही का आदेश दिया।

    रिहाई

    दिल्ली सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड ने जेल में अच्छे आचरण के आधार पर समय से पहले रिहाई की सिफारिश की, जिसे उपराज्यपाल ने मंज़ूर किया। 1 जून 2020 की शाम मनु शर्मा को तिहाड़ जेल से रिहा किया गया। उस समय कई लोगों ने इस फैसले पर सवाल भी उठाए।

    इस केस से क्या सीखें

    • गवाही मायने रखती है: अपराध देखा हो तो पुलिस को सच बताएं। गवाहों को धमकी मिले तो गवाह संरक्षण योजना, 2018 के तहत सुरक्षा मांगी जा सकती है।
    • झूठी गवाही भी अपराध है: अदालत में बयान से मुकरने पर perjury की कार्रवाई हो सकती है।
    • अपील का रास्ता खुला है: निचली अदालत का फैसला अंतिम नहीं होता; पुलिस और पीड़ित पक्ष ऊपरी अदालत जा सकते हैं।
    • पार्टी और बार में सुरक्षा: आयोजक हथियार लेकर आने पर रोक लगाएं, बंद होने का समय तय रखें और किसी विवाद पर तुरंत 112 पर कॉल करें।
    • सोशल मीडिया पर संयम: चल रहे केस में अफवाह या किसी की पहचान वाली जानकारी शेयर न करें।

    जेसिका लाल हत्याकांड में किसे सजा हुई?

    मनु शर्मा को हत्या के लिए उम्रकैद हुई। सबूत मिटाने के लिए विकास यादव और अमरदीप सिंह गिल को चार-चार साल की सजा मिली।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को बरी क्यों किया था?

    फरवरी 2006 में ट्रायल कोर्ट ने कहा कि सबूतों की कड़ियां अधूरी हैं; कई अहम गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे।

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कब दिया?

    19 अप्रैल 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला और उम्रकैद बरकरार रखी।

    मनु शर्मा जेल से कब रिहा हुआ?

    सजा समीक्षा बोर्ड की सिफारिश और उपराज्यपाल की मंज़ूरी के बाद 1 जून 2020 को तिहाड़ से रिहा हुआ।

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