क्या हुआ: 10 जनवरी 1999 की सुबह दिल्ली के लोधी रोड पर तेज़ रफ्तार BMW ने पुलिस नाके पर खड़े लोगों को टक्कर मारी; 6 लोगों की मौत हुई, जिनमें 3 पुलिसकर्मी थे
कब: हादसा 10 जनवरी 1999; सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला 3 अगस्त 2012
कहां: लोधी रोड, लोधी कॉलोनी थाना क्षेत्र, नई दिल्ली
आपके लिए मतलब: यह केस बताता है कि नशे में या तेज़ रफ्तार ड्राइविंग और हादसे के बाद भागना कितना भारी पड़ता है; अदालत ने इसे सिर्फ “लापरवाही” मानने से इनकार किया
क्या करें: शराब पीकर गाड़ी न चलाएं, नाके पर रफ्तार कम रखें; हादसा हो तो रुकें, 112 पर कॉल करें और घायलों को अस्पताल पहुंचाने में मदद करें
जनवरी 1999 की एक ठंडी सुबह। दिल्ली का लोधी रोड अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। सड़क पर पुलिस का एक चेकिंग नाका लगा था। तभी तेज़ रफ्तार से आई एक काली BMW ने नाके पर खड़े लोगों को रौंद दिया। कुछ ही सेकंड में छह ज़िंदगियां खत्म हो गईं, जिनमें तीन पुलिसकर्मी थे। गाड़ी रुकी नहीं, आगे निकल गई।
यही मामला आगे चलकर “BMW हिट एंड रन केस” के नाम से जाना गया। अदालतों में यह 13 साल से ज़्यादा चला। गवाहों के मुकरने, एक टीवी स्टिंग और सबूत मिटाने के आरोपों से भरा यह केस देश में सड़क हादसों पर कानून की बहस का अहम हिस्सा बन गया। यह कहानी अदालती रिकॉर्ड और उस समय की प्रमुख रिपोर्ट्स पर आधारित है।
10 जनवरी 1999: नाके पर क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और द हिंदू व इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स के मुताबिक 10 जनवरी 1999 की तड़के लोधी रोड पर पुलिस ने चेकिंग के लिए नाका लगाया था। तेज़ रफ्तार BMW वहां मौजूद लोगों से टकराई। हादसे में छह लोगों की जान गई। इनमें तीन पुलिसकर्मी थे, जो ड्यूटी पर थे।
अभियोजन के मुताबिक कार चला रहे युवक संजीव नंदा गुड़गांव (अब गुरुग्राम) की एक पार्टी से लौट रहे थे। उस समय उनकी उम्र 21 साल थी। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार वे पूर्व नौसेना प्रमुख एस.एम. नंदा के पोते हैं।
तेल के निशान ने खोला राज़
हादसे के बाद कार मौके से चली गई। लेकिन टक्कर से गाड़ी को नुकसान पहुंचा था और उससे तेल टपक रहा था। उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस सड़क पर बने तेल के निशान का पीछा करते हुए गोल्फ लिंक्स के एक घर तक पहुंची। वहां BMW मिली। अभियोजन का आरोप था कि वहां गाड़ी को धोकर साफ किया जा रहा था, ताकि सबूत मिट जाएं।
बताया गया कि गाड़ी करीब एक महीना पुरानी थी और उस पर विदेशी नंबर प्लेट थी। मौके से नंबर प्लेट का टूटा हिस्सा भी मिला था। इन्हीं कड़ियों ने केस को मज़बूत बनाया।
सबूत मिटाने के आरोप और अदालत का अंतिम रुख
कार को साफ करने और सबूत छिपाने के आरोप में तीन और लोगों पर मुकदमा चला। निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था और हाईकोर्ट ने उनकी सज़ा घटाई थी। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 1 अगस्त 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों को बरी कर दिया। इसलिए उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता, और हम उनके नाम नहीं दे रहे।
गवाह, स्टिंग और लंबा मुकदमा
मुकदमे के दौरान कई गवाह अपने बयान से पलट गए, जिससे केस और उलझ गया। इसी दौरान एक न्यूज़ चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में आरोप सामने आया कि केस से जुड़े वकील एक अहम गवाह को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दो वरिष्ठ वकीलों को चार महीने के लिए वकालत करने से रोक दिया। इस प्रकरण ने न्याय व्यवस्था में गवाहों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए।
तीन अदालतें, तीन फैसले
निचली अदालत (2008)
ट्रायल कोर्ट ने संजीव नंदा को IPC की धारा 304 भाग II (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी माना और पांच साल की सज़ा सुनाई। द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस दोनों ने यही सज़ा दर्ज की है।
दिल्ली हाईकोर्ट (जुलाई 2009)
हाईकोर्ट ने अपराध को धारा 304A (लापरवाही से मौत) में बदल दिया और सज़ा घटाकर दो साल कर दी। वे करीब इतना समय पहले ही जेल में बिता चुके थे।
सुप्रीम कोर्ट (3 अगस्त 2012)
दिल्ली पुलिस (राज्य) ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन की बेंच ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए धारा 304 भाग II के तहत दोष बहाल किया। अदालत ने माना कि यह सिर्फ लापरवाही का मामला नहीं था।
हालांकि बेंच ने जेल में बिताए दो साल को ही सज़ा माना, लेकिन फैसले के मुताबिक दो और शर्तें जोड़ीं:
- छह महीने के भीतर केंद्र सरकार को 50 लाख रुपये देने होंगे, जिनका इस्तेमाल उन हिट एंड रन पीड़ितों के मुआवज़े में होगा जिनके दोषी नहीं मिलते। ऐसा न करने पर एक साल की साधारण कैद।
- दो साल तक सामुदायिक सेवा, जिसकी व्यवस्था केंद्र का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय करेगा। ऐसा न करने पर दो साल की साधारण कैद।
अदालत ने हादसे के बाद घायलों को छोड़कर भाग जाने को “बेहद निंदनीय” बताया। द हिंदू के मुताबिक बेंच ने कहा कि कम से कम पीड़ितों पर कुछ दया दिखाई जा सकती थी। अदालत ने यह भी साफ किया कि उम्र या पैसे देने की पेशकश अपने आप में सज़ा कम करने का आधार नहीं है।
फिल्मों तक पहुंची कहानी
इस केस की गूंज अदालत से बाहर भी रही। 2013 में आई फिल्म “जॉली LLB” की कहानी को इस तरह के हाई-प्रोफाइल हिट एंड रन मामलों से प्रेरित माना जाता है। फिल्म ने अमीर-गरीब के बीच न्याय की लड़ाई को आम लोगों तक पहुंचाया।
इस केस से क्या सीखें
इस हादसे को 27 साल हो चुके हैं, लेकिन इसकी सीख आज भी उतनी ही ज़रूरी है। दिल्ली में सर्दियों में रात और सुबह कोहरा, ज़्यादा नाके और कम ट्रैफिक, ये सब तेज़ रफ्तार को और खतरनाक बना देते हैं।
- नशे में गाड़ी नहीं: पार्टी के बाद कैब, मेट्रो या ऐसा दोस्त चुनें जिसने शराब न पी हो।
- नाके पर रफ्तार कम: बैरिकेड, रिफ्लेक्टर या पुलिस की टॉर्च दिखे तो तुरंत धीमे हो जाएं।
- हादसा हो तो भागें नहीं: रुकें, 112 पर कॉल करें और घायल को अस्पताल पहुंचाने में मदद करें। अदालत ने भी भागने को गंभीर माना।
- गवाह बनें, डरें नहीं: हादसा देखा है तो पुलिस को सच बताएं। गवाहों के बयान ही ऐसे मामलों में न्याय दिलाते हैं।
- युवा ड्राइवरों से बात करें: घर में किसी ने नई गाड़ी या लाइसेंस लिया है तो रफ्तार और नशे के खतरों पर खुलकर बात करें।
लोधी रोड का वह नाका आज भी याद दिलाता है कि एक गलत फैसला कई परिवारों की ज़िंदगी बदल सकता है, और कानून देर से ही सही, जवाब मांगता है।
BMW हिट एंड रन केस क्या है?
10 जनवरी 1999 को दिल्ली के लोधी रोड पर एक तेज़ रफ्तार BMW ने पुलिस नाके पर लोगों को टक्कर मारी, जिसमें 3 पुलिसकर्मियों समेत 6 लोगों की मौत हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
3 अगस्त 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने धारा 304 भाग II के तहत दोष बहाल किया, दो साल की जेल को पर्याप्त माना और 50 लाख रुपये मुआवज़ा कोष में देने व दो साल सामुदायिक सेवा का आदेश दिया।
पुलिस कार तक कैसे पहुंची?
रिपोर्ट्स के मुताबिक क्षतिग्रस्त कार से टपके तेल के निशान का पीछा करके पुलिस गोल्फ लिंक्स के एक घर तक पहुंची।





