क्या हुआ: जुलाई 1995 में दिल्ली की यूथ कांग्रेस नेता और प्रशिक्षित पायलट नैना साहनी की हत्या हुई; पति सुशील शर्मा दोषी ठहराए गए
कब: हत्या 2 जुलाई 1995 की रात; सज़ा नवंबर 2003; सुप्रीम कोर्ट का फैसला 8 अक्टूबर 2013; रिहाई 21 दिसंबर 2018
कहां: कनॉट प्लेस इलाका, नई दिल्ली (FIR नंबर 486/95, थाना कनॉट प्लेस)
आपके लिए मतलब: इस केस ने दिखाया कि मौके के सबूत और तेज़ जांच कैसे सबसे चालाक अपराधी तक पहुंचा देते हैं; साथ ही उम्रकैद में रिहाई के नियमों पर बड़ी बहस छिड़ी
क्या करें: रिश्ते में शक, धमकी या हिंसा हो तो चुप न रहें; महिला हेल्पलाइन 181 या पुलिस 112 पर संपर्क करें
2 जुलाई 1995 को दिल्ली पुलिस ने कनॉट प्लेस इलाके के अशोक यात्री निवास परिसर में चल रहे बगिया रेस्टोरेंट से एक महिला का जला हुआ शव बरामद किया। इस बरामदगी ने पूरे देश को हिला दिया। यही मामला आगे चलकर “तंदूर कांड” के नाम से जाना गया।
यह कहानी है नैना साहनी की। वह प्रशिक्षित पायलट थीं और दिल्ली यूथ कांग्रेस (गर्ल्स विंग) की प्रदेश महासचिव थीं। उनके पति सुशील शर्मा उस समय दिल्ली यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। यह सब बातें बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज कीं।
उस रात क्या हुआ
अदालतों ने सुशील शर्मा को पत्नी नैना साहनी की हत्या और फिर सबूत मिटाने के लिए शव को तंदूर में जलाने की कोशिश का दोषी माना। जिस अशोक यात्री निवास में बगिया रेस्टोरेंट था, वह बाद में शांग्रीला होटल के नाम से जाना गया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हत्या की वजह शक और “पजेसिवनेस” थी।
पुलिस ने मौके से रेस्टोरेंट मैनेजर केशव कुमार को गिरफ्तार किया। सुशील शर्मा फरार हो गए।
जांच और गिरफ्तारी
टाइम्स ऑफ इंडिया की टाइमलाइन के मुताबिक पुलिस ने 10 जुलाई 1995 को सुशील शर्मा को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया। 12 जुलाई को दिल्ली की अदालत ने उन्हें 10 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा। पुलिस ने 27 जुलाई 1995 को चार्जशीट दाखिल कर दी, यानी घटना के महज़ 25 दिन बाद।
9 मई 1996 को ट्रायल कोर्ट ने पांच लोगों के खिलाफ हत्या (धारा 302), आपराधिक साज़िश (120-B) और सबूत मिटाने (201) के आरोप तय किए। मुकदमा लंबा चला। 1999 में गवाहियां दर्ज हुईं, सितंबर 1999 से रोज़ाना सुनवाई शुरू हुई। अप्रैल 2001 में हाईकोर्ट ने केस को एक जज से दूसरे जज की अदालत में भेजा। अगस्त 2003 में जज ने खुद अशोक यात्री निवास जाकर मौके का मुआयना किया।
फांसी से उम्रकैद तक
3 नवंबर 2003 को ट्रायल कोर्ट ने सुशील शर्मा को दोषी ठहराया और 7 नवंबर 2003 को फांसी की सज़ा सुनाई। मैनेजर केशव कुमार को सात साल की कठोर कैद मिली। शर्मा ने दिसंबर 2003 में हाईकोर्ट में अपील की। 19 फरवरी 2007 को दिल्ली हाईकोर्ट ने फांसी की सज़ा बरकरार रखी।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 8 अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने दोष तो बरकरार रखा, लेकिन फांसी को उम्रकैद में बदल दिया। कोर्ट ने कहा कि हत्या “बिगड़े निजी रिश्ते” का नतीजा थी और दोषी के सुधरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फैसले में यह भी दर्ज है कि मुर्दाघर में शव दिखाए जाने पर वह रो पड़ा था।
29 साल बाद रिहाई
सज़ा समीक्षा बोर्ड (SRB) ने 4 अक्टूबर 2018 को उनकी समय से पहले रिहाई की अर्ज़ी ठुकरा दी। इसके खिलाफ वह हाईकोर्ट गए। 21 दिसंबर 2018 को जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल की बेंच ने SRB के फैसले को “अस्पष्ट और अतार्किक” बताते हुए रद्द कर दिया और “तुरंत” रिहाई का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि छूट मिलाकर 29 साल की कैद के बाद उन्हें और जेल में रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचा। उसी दिन वह तिहाड़ जेल से बाहर आ गए।
इस केस से क्या सीख मिलती है
- चौकसी: आसपास कुछ भी संदिग्ध दिखे, जैसे बंद जगह से अजीब धुआं या आग, तो तुरंत 112 पर बताएं।
- तेज़ जांच: 25 दिन में चार्जशीट से साफ है कि मौके के सबूत और फॉरेंसिक जांच कितनी अहम है।
- रिश्तों में हिंसा को हल्के में न लें: शक, नियंत्रण या धमकी घरेलू हिंसा के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। मदद के लिए महिला हेल्पलाइन 181 मौजूद है।
- कानूनी बहस: इस केस ने उम्रकैद काट रहे कैदियों की समय से पहले रिहाई के नियमों और SRB के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए।
तंदूर कांड क्या है?
2 जुलाई 1995 को दिल्ली में नैना साहनी की हत्या का मामला, जिसमें उनके पति सुशील शर्मा दोषी ठहराए गए।
सुशील शर्मा को क्या सज़ा मिली?
2003 में फांसी, जिसे 2007 में हाईकोर्ट ने बरकरार रखा; 8 अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदला।
सुशील शर्मा जेल से कब छूटे?
21 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट के तुरंत रिहाई के आदेश के बाद।

