क्या हुआ: इंडियन एक्सप्रेस की वरिष्ठ पत्रकार शिवानी भटनागर की पूर्वी दिल्ली स्थित उनके फ्लैट में हत्या; एक पूर्व IPS अफसर समेत चार लोगों पर साज़िश और हत्या का मुकदमा चला
कब: जनवरी 1999 में हत्या; मार्च 2008 में निचली अदालत का फैसला; 12 अक्टूबर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
कहां: नवकुंज अपार्टमेंट्स, पटपड़गंज, पूर्वी दिल्ली; मुकदमा कड़कड़डूमा कोर्ट में चला
आपके लिए मतलब: हाईकोर्ट ने सिर्फ कातिल प्रदीप शर्मा की उम्रकैद बरकरार रखी; पूर्व IPS आर.के. शर्मा समेत तीन बरी हुए। केस दिखाता है कि अदालत शक पर नहीं, सबूत पर सज़ा देती है
क्या करें: अनजान व्यक्ति के लिए दरवाज़ा खोलने से पहले पहचान पक्की करें; सोसाइटी का विज़िटर रजिस्टर और CCTV हमेशा चालू रखें
जनवरी 1999 की एक सर्द दोपहर। पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज में नवकुंज अपार्टमेंट्स के एक फ्लैट का दरवाज़ा एक अनजान शख्स ने खटखटाया। उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा और शादी का कार्ड था। कुछ देर बाद उसी फ्लैट में इंडियन एक्सप्रेस की वरिष्ठ पत्रकार शिवानी भटनागर मृत मिलीं। उनका दो महीने का बेटा उस वक्त घर में ही था।
यह मामला अगले बारह साल तक दिल्ली की अदालतों, पुलिस और मीडिया की सुर्खियों में रहा। इसमें एक ऐसे वरिष्ठ IPS अफसर का नाम आया, जो कभी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में तैनात रह चुके थे। आखिर में फैसला वहां पहुंचा, जहां अदालत ने कहा कि जज भी इंसान हैं और उन्हें भी शक होता है, लेकिन वे शक के आधार पर सज़ा नहीं दे सकते।
क्या हुआ था उस दिन
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट ने माना कि हत्यारा मिठाई का डिब्बा और शादी का कार्ड देने के बहाने फ्लैट तक पहुंचा था। सोसाइटी के रजिस्टर में उसने अपनी एंट्री दर्ज की थी। अदालत के अनुसार उसने बिजली के तार से शिवानी का गला घोंटा। NDTV की रिपोर्ट में हत्या की तारीख 23 जनवरी 1999 बताई गई है, जबकि द हिंदू ने 21 जनवरी लिखा है।
शिवानी एक अनुभवी पत्रकार थीं। रिपोर्टों के मुताबिक PMO कवर करने के दौरान उनकी मुलाकात IPS अधिकारी रविकांत (आर.के.) शर्मा से हुई थी।
घटनाक्रम: एक नज़र में
- जनवरी 1999: पटपड़गंज के नवकुंज अपार्टमेंट्स में शिवानी भटनागर की हत्या।
- सितंबर 2002: पूर्व IPS आर.के. शर्मा ने दिल्ली पुलिस के सामने सरेंडर किया, इसके बाद से वे तिहाड़ जेल में रहे।
- मार्च 2008: निचली अदालत ने आर.के. शर्मा, प्रदीप शर्मा, श्री भगवान शर्मा और सत्य प्रकाश को उम्रकैद सुनाई।
- 12 अक्टूबर 2011: दिल्ली हाईकोर्ट ने आर.के. शर्मा, श्री भगवान शर्मा और सत्य प्रकाश को बरी किया; प्रदीप शर्मा की उम्रकैद बरकरार।
- फरवरी 2012: दिल्ली पुलिस की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने आर.के. शर्मा को नोटिस जारी किया।
जांच: पुलिस की थ्योरी क्या थी
दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि हत्या एक सोची-समझी साज़िश थी। पुलिस के मुताबिक आर.के. शर्मा ने भाड़े के लोगों के ज़रिये हत्या करवाई, क्योंकि उन्हें कथित तौर पर डर था कि शिवानी उनके रिश्ते की बातें सार्वजनिक कर देंगी। पुलिस का यह भी आरोप था कि शर्मा ने अपने बड़े पद का इस्तेमाल गवाहों को प्रभावित करने और खुद को केस से बाहर निकालने के लिए किया।
पुलिस ने साज़िश की कड़ियां जोड़ने के लिए आरोपियों के फोन कॉल रिकॉर्ड और उनके आपसी संबंधों को आधार बनाया। शर्मा कुछ समय तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहे और सितंबर 2002 में उन्होंने सरेंडर किया।
गिरफ्तारियां और निचली अदालत का फैसला
मुकदमा पूर्वी दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में चला। मार्च 2008 में अदालत ने चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा दी। NDTV के मुताबिक जज ने आर.के. शर्मा को मौत की सज़ा न देने की वजह उनका “शानदार” सेवा रिकॉर्ड बताया था। अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस अपराध को छोड़ दें तो वे देश के लिए एक संपत्ति रहे हैं।
बचाव पक्ष का कहना था कि शर्मा के खिलाफ सबूत ज़्यादातर परिस्थितिजन्य हैं और पुलिस ने उन्हें फंसाने के लिए सबूतों से छेड़छाड़ की है। चारों ने फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट: शक काफी नहीं, सबूत चाहिए
12 अक्टूबर 2011 को जस्टिस बी.डी. अहमद और जस्टिस मनमोहन सिंह की खंडपीठ ने फैसला सुनाया। अदालत ने आर.के. शर्मा, श्री भगवान शर्मा और सत्य प्रकाश को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया और तिहाड़ से तुरंत रिहाई का आदेश दिया। तब तक शर्मा करीब नौ साल जेल में बिता चुके थे।
NDTV के अनुसार अदालत ने कहा, “हमारे सामने मौजूद सबूत उच्च स्तर के नहीं हैं… जज भी दूसरे इंसानों की तरह शक करते हैं, लेकिन वे सिर्फ शक के आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकते।” द हिंदू के मुताबिक बेंच ने पाया कि अभियोजन तीनों आरोपियों और आर.के. शर्मा के पुराने संबंध साबित नहीं कर सका और कॉल रिकॉर्ड में कई विसंगतियां थीं। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील से सहमति जताई कि कॉल रिकॉर्ड गढ़े गए थे।
लेकिन प्रदीप शर्मा के मामले में तस्वीर अलग थी। हाईकोर्ट ने माना कि सोसाइटी के रजिस्टर में उसकी एंट्री और मिठाई वाले पॉलीथीन बैग से मिले उंगलियों के निशान साबित करते हैं कि वह उस दिन फ्लैट पर था। अदालत ने कहा कि हत्या का मकसद भले साफ न हो, लेकिन हत्या उसी ने की। उसकी उम्रकैद बरकरार रही।
कोर्ट में आज की स्थिति
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अभियोजन ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी। फरवरी 2012 में दिल्ली पुलिस की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने आर.के. शर्मा को नोटिस जारी किया। इस रन में जिन स्रोतों को हमने खोला, उनमें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले की जानकारी नहीं मिली, इसलिए हम उस पर कोई दावा नहीं कर रहे।
इस केस के सबक
1. फॉरेंसिक सबूत सबसे मज़बूत कड़ी
पूरा मामला कई सालों और कई दावों से गुज़रा, लेकिन जो बात अदालत में टिकी वह थी विज़िटर रजिस्टर की एंट्री और पॉलीथीन बैग पर मिले उंगलियों के निशान। यानी मौके से ठीक तरह जुटाए गए छोटे सबूत भी कितने अहम होते हैं।
2. कॉल रिकॉर्ड पर अंधा भरोसा नहीं
साज़िश की थ्योरी इसलिए गिरी क्योंकि कॉल रिकॉर्ड में विसंगतियां थीं। हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच एजेंसी पर हर डिजिटल सबूत को बेदाग रखने की दोहरी ज़िम्मेदारी होती है।
3. शक और सज़ा में फर्क
अदालत ने साफ कहा कि अपराध “उचित संदेह से परे” साबित होना चाहिए। यही आपराधिक न्याय का मूल सिद्धांत है, चाहे आरोपी कितना भी बड़ा या छोटा हो।
घर की सुरक्षा के लिए ज़रूरी बातें
- कूरियर, कार्ड या तोहफा देने आए अनजान व्यक्ति के लिए दरवाज़ा पूरा न खोलें; सेफ्टी चेन या डोर व्यूअर का इस्तेमाल करें।
- सोसाइटी में आने वाले हर विज़िटर का नाम, फोन नंबर और पहचान पत्र दर्ज करवाएं।
- गेट और लिफ्ट के CCTV चालू रखें और उनकी रिकॉर्डिंग कुछ हफ्ते सुरक्षित रखें।
- घर में अकेले हों तो किसी परिचित को बताकर रखें; आपात स्थिति में 112 पर कॉल करें।
- किसी से धमकी मिले तो उसे नज़रअंदाज़ न करें, लिखित शिकायत पुलिस में दें।
शिवानी भटनागर केस आज भी इस बात की याद दिलाता है कि ताकतवर नामों से जुड़े मामलों में भी आखिरी फैसला सबूतों की मज़बूती से तय होता है।
शिवानी भटनागर की हत्या कब और कहां हुई?
जनवरी 1999 में पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज स्थित नवकुंज अपार्टमेंट्स में उनके फ्लैट पर।
क्या आर.के. शर्मा को सज़ा हुई?
2008 में निचली अदालत ने उम्रकैद दी थी, लेकिन 12 अक्टूबर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।
हत्या का दोषी कौन है?
हाईकोर्ट ने प्रदीप शर्मा की उम्रकैद बरकरार रखी और माना कि हत्या उसी ने की थी।

